तालछापर अभ्यारण्य चूरू के बारे पूरी जानकारी (Study of Talchhaper Wild Life Sanctuary)


तालछापर अभ्यारण्यका  का अध्ययन
(Study of Talchhaper Wild Life Sanctuary)


सामान्य परिचय
कृष्ण सारस्तु चरित मृगो यत्र स्वभावतः। स ज्ञेयो देशो म्लेक्षदेशस्त्वत परः ।।
अर्थात् जहां पर स्वभाव से ही काले रंग के मृग रहते हों वह यज्ञ करने योग्य देश है। इससे भिन्न म्लेच्छ देश है।
प्रकृति ने हमें वन्य जीवों का अदभुत, विलक्षण औररहस्यमय संसार प्रदान किया है। इस रहस्यमयसंसार में से एक है “कृष्ण मृग" (काला हिरण)। थार के रेगिस्तान में स्थित ताल छापर अभयारण्य कालेहिरणों का प्राकृतिक आवास स्थल है। कृष्ण मृग अभयारण्य समतल घास का मैदान है जिसमें छितराये,हुए खेजड़ी, देशी बबूल आदि के वृक्ष हैं। घास का यह समतल मैदान कुछ-कुछ अफ्रीका के सवाना के
घास के मैदानों जैसा नजर आता है। अभयारण्य के पश्चिमी दिशा में गोपालपुरा ग्राम के पास कुछपहाड़ियां स्थित हैं। इन पहाड़ियों एवं अभयारण्य के मध्य का क्षेत्र अभयारण्य का जलग्रहण क्षेत्र थालेकिन वर्तमान में इस क्षेत्र में नमकउत्पादन होने से इस क्षेत्र का पानी अभयारण्य में नहीं आता है।

इतिहास>
ब्रिटिश काल में ताल छापर अभयारण्य बीकानेर के महाराजा का शिकारगाह था। बीकानेर महाराजाद्वारा इस अभयारण्य का रख-रखाव शिकारगाह के रूप में स्वयं के लिए तथा उनके मेहमानों के लिएकिया जाता था। आजादी के बाद राज्य सरकार ने 1962 में इसे वन्यजीव आरक्षित क्षेत्र घोषित कर इसमें शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध लागू कर दिया तथा तथा कालांतर में इसे अभयारण्य घोषित कर दिया गया।
आरक्षित क्षेत्र का क्षेत्रफल शुरू में 820 हेक्टेयर में था जिसका काफी हिस्सा नमक बनाने हेतु हस्तातरित
करने के कारण अभयारण्य का क्षेत्रफल धीरे-धीरे सिकुड़ कर वर्तमान में 719 हेक्टेयर रह गया है। वर्तमानमें अभयारण्य का प्रबंधन वन विभाग, राजस्थान सरकार द्वारा एक स्वीकृत प्रबंध योजना के तहत कियाजा रहा है।

जलवायु>>
इस क्षेत्र में जलवायु साधारणतया शुष्क है जिसे मुख्यतः सर्दी (अक्टूबर से माच), गर्मी (अप्रैल सेजून) एवं मानसून (जुलाई से सितम्बर) तीन ऋतुओं में बांटा जा सकता है। गर्मियों में दक्षिण-पश्चिमीहवाएं तेज और गर्म हो जाती है। मई और जून में तो ये बहुत गर्म हो जाती है, जिन्हें "लू' कहते हैं।गर्मियों में तापमान 48°C तक पहुंच जाता है। दिसम्बर-जनवरी में तापमान 1°C तक गिर जाता है। वर्षाका औसत काफी कम है जो लगभग 300 मिमी है।
वनस्पति भारतीय वनों के 'चैम्पियन एवं सेठ' के वर्गीकरण के अनुसार यह "ट्रॉपिकल फॉरेस्ट' की श्रेणीमें आता है। अभयारण्य क्षेत्र को "ट्रॉपिकल थॉर्न फॉरेस्ट" एवं उप-समूह "6 B-C डेजर्ट थॉर्न फॉरेस्ट' वगीकृत किया जा सकता है। अभयारण्य क्षेत्र में पाई जाने वाली मुख्य वनस्पति धास है जिसकेतर्गत नोथ, लापला आदि मुख्य हैं। झाड़ियों में मुख्यतः वेर, लाणा आदि हैं। वृक्ष बहुत कम मात्रा में
राए हुए है। खेजडी, देशी बबूल, केर, जाल आदि मुख्य वृक्ष हैं।

वन्य प्राणी>>
क .वन्य पशु
ताल छापर अभयारण्य में वन्य पशुओं में काला हिरण, लोमड़ी, रोझा, चिंकारा, खरगोश आदि पाये
जाते हैं। इनमें से काला हिरण (कृष्ण मृग) ही मुख्य वन्य प्राणी है।

कृष्ण मृग : सामान्य विवरण>>
अभयारण्य का मुख्य आकर्षण कृष्ण मृग है। वर्तमान में 719 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस अभ्यारण्य
लगभग 1680 कृष्ण मृग है। घास का यह समतल मैदान कृष्ण मृगों का प्राकृतिक आवास स्थल है।
पण मृग लम्बी दूरी तक तेज दौड़ने वाला बहुत ही सुन्दर प्राणी है। यह 60-80 कि.मी. तक की रफ्तार
सि दौड़ सकता है इसकी खाल चिकनी और मुलायम बालों से भरी होती है। कृष्ण मृग की कचे तक औसत
उचाई 80 सेमी तथा औसत वजन किग्रा के लगभग होता है। केवल नर के सींग होते हैं जो चक्राकार
कधों की ओर झुके हुए तीन से चार घुमाव लिये हुए होते हैं तथा 75 सेमी तक लम्बे होते हैं। जन्म के
समय नर एवं मादा दोनों हल्के भूरे रंग के होते हैं। तीन वर्ष का होते-होते नर के सींग पूर्ण विकसित
हो जाते हैं तथा ऊपरी हिस्सा काले रंग का हो जाता है तथा नीचे का आधा हिस्सा भूरे रंग का रहता


सामाजिक संरचना
काले हिरण मुख्यतः 25-30 के समूह में रहते हैं। लेकिन गर्मियों में इसके 500-700 तक क झुण्ड भी देखे जा सकते हैं। समूह मुखिया अधिकतर समझदार मादा होती है। कुछ समूह सिर्फ मादाओं के,कुछ सिर्फ नर हिरणों के तथा कुछ समूहों में नर एवं मादा हिरण मिश्रित रूप से भी दिखाई पड़ते हैं।

जन्म एवं बच्चे>>
मादा हिरण 19 से 23 माह में पूर्ण विकसित हो जाती है जबकि नर हिरण को पूर्ण विकसित होनेमें 3 वर्ष लगते हैं। कृष्ण मृगों में हरम की प्रथा होती है। मैटिंग समय में नर हिरण अपने नथूनों को ऊयाकरके तथा अपने सीगों को अपने कंधों के समान्तर करके मादाओं को आकर्षित करते हैं। मादा हिरण शरीर एवं सुन्दरता में श्रेष्ठ नर को चुनती है। मादा अमूमन एक बार में एक ही बच्चे को जन्म देती है।
मादा ही बच्चे की देखभाल करती है। बच्चा लगभग एक वर्ष तक मादा के साथ ही रहता है। गर्भकाल
150 दिन होता है तथा इसकी आयु 12-16 वर्ष तक होती है।
(ख) पक्षी
अभयारण्य का दूसरा मुख्य आकर्षण देशी एवं विदेशी पक्षी हैं। 100 से भी अधिक पक्षियों की प्रजाति
विभिन्न मौसमों में अभयारण्य में देखी जा सकती है। जिनमें मुख्यतः हीरोन, काईट. ईगल, वल्चर, सैंडग्रूज,
वी-ईटर, ववलर, किंगफिशर, स्वाइक, प्लेक विंगड, स्टिल्ट, सनवर्ड आदि हैं। डेमोयजिल क्रेन जिसे स्थानीय भाषा में कुरजां कहते हैं, अभयारण्य का विशेष आकर्षण है। प्रसिद्ध कुरजां पक्षी शताब्दियो
हजारों मील की दूरी तय करके यहां आते हैं। इसी कारण से यह पक्षी यहां की संस्कृति का हिस्सा इ
चुके हैं | बिरह का प्रसिद्ध गीत “कुरजां ए म्हारो भंवर मिला दिज्यो' इसका उदाहरण है।







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