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बीकानेर किसान आंदोलन | बीकानेर किसान आंदोलन कब हुआ | Bikaner kisan Andolan

बीकानेर किसान आंदोलन


• गंगनहर क्षेत्र में कृषक आंदोलन : सन् 1929-30 में प्रारम्भ गंगनहर क्षेत्र का किसान आंदोलन बीकानेर राज्य का प्रथम किसान आंदोलन था। यह आंदोलन जमींदारा एसोसिएशन के बैनर तले चलाया गया। बीकानेर राज्य 4 सितम्बर, 1920 को भारत सरकार को सतलज नदी का पानी बीकानेर में नहर द्वारा पहुँचाने की योजना को स्वीकृत करवाने में सफल हुआ। उस समय इस योजना पर साढ़े पाँच करोड़ की लागत का अनुमान लगाया गया। यद्यपि इस भूमि में सिंचाई की सुविधाएँ सन् 1927-28 में मिलनी प्रारम्भ हुई किन्तु गंगनहर में पर्याप्त पानी न होने के कारण किसानों को खेती के लिए पूरा पानी उपलब्ध नहीं हो रहा था। इसके बावजूद राज्य सरकार उन किसानों से आंबियाना (पानी का शुल्क ) पूरी दरों से वसूल कर रही थी। इसके अतिरिक्त राज्य सरकार ऐसे किसानों जिन्होंने जमीन के मूल्य की किश्तों को देने में देर कर दी थी, उन पर ब्याज की दर अत्यधिक बढ़ाकर वसूल करने लगी। ये दोनों ही बातें इस क्षेत्र के किसानों के असंतोष का कारण थी। किसानों ने अधिक ब्याज देने की अपेक्षा राज्य सरकार से खरीदी हुई भूमि वापस लौटाना अधिक उपयुक्त समझा। किसानों ने सरकार के विरुद्ध संगठित होकर दबाव डालने का निश्चय किया। 16 अप्रैल, 1929 को किसानों ने जमींदारा एसोसिएशन स्थापित कर ली। इसका पहला अध्यक्ष सरदार दरबार सिंह पुत्र शेरसिंह को बनाया गया। इस एसोसिएशन के प्रयासों का यह परिणाम हुआ कि 3 मार्च, 1930 को महाराजा गंगासिंह स्वयं गंगनहर गए और गंगनहर क्षेत्र के किसानों की मांगों के संबंध में अनेक राहत देने की घोषणा की।

बीकानेर किसान आंदोलन

दूधवा खारा किसान आंदोलन : बीकानेर के दूधवाखारा ठिकाने के किसान आंदोलन का कारण ठिकाने के गाँवों की भूमि का बंदोबस्त होना ही था। दूधवाखारा किसान आंदोलन के संबंध में किसान नेता चौधरी हनुमानसिंह व बीकानेर राज्य प्रजा परिषद के अध्यक्ष पंडित मघाराम वैद्य को गिरफ्तार कर कठोर यातनाएँ दी गई। दूधवाखारा में किसानों की स्थिति की जाँच करने वाले दल के सदस्य राव माधोसिंह को भी राज्य से निर्वासित कर दिया गया।


 •राजगढ़ किसान आन्दोलन  : 1945 के अंत तक चूरू की राजगढ़ निजामत के किसानों में भी जागृति पैदा हुई और उन्होंने सत्याग्रह किया। उनके नेता स्वामी कर्मानंद व चौ. हनुमानसिंह की गिरफ्तारी होने पर तारानगर के किसानों ने विरोध प्रदर्शन किया। 
21 जून, 1946 को महाराजा शार्दूल सिंह ने राज्य में शीघ्र ही उत्तरदायी शासन स्थापित करने की घोषणा की। लेकिन 1 जुलाई, 1946 को रायसिंह नगर में एक जुलूस पर गोली काण्ड में 'बीरबल' नामक व्यक्ति की शहादत ने स्थिति को पुनः बिगाड़ दिया। 6 जुलाई, 1946 को किसान दिवस मनाया गया।

कागड़ किसान आन्दोलन  –कांगड़ बीकानेर राज्य की रतनगढ़ तहसील का एक छोटा सा गाँव है। 1937 से पूर्व यह गाँव खालसा था जिसे 1937 में जागीर क्षेत्र में दे दिया गया। इसी के साथ वहाँ जागीरदारों ने अपने जुल्म ढाने शुरू कर दिये । 1945-46 में कांगड़ गाँव में अच्छी फसल नहीं हुई। किसानों ने अनुचित लागबागें न लेने की प्रार्थना की लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई व ठाकुर गोपसिंह ने अपने अत्याचार बढ़ा दिए। इसकी जानकारी होने पर 1 नवम्बर, 1946 को बीकानेर प्रजा परिषद के सात कार्यकर्ता- स्वामी सच्चिदानंद चौधरी, हंसराज आर्य, पंडित गंगादत्त रंगा, मास्टर दीपचंद, चौधरी मोजीराम, प्रोफेसर केदारनाथ शर्मा और चौधरी रूपाराम कांगड़ गए। वहाँ इनके साथ भी ठाकुर गोपसिंह ने दुर्व्यवहार किया। इससे किसानों में एक नई चेतना जाग्रत हुई।


बीकानेर किसान आंदोलन

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