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परासरण (OSMOSIS) | परासरण की क्रिया विधि | परसरान की जानकारी विस्तार से | Know the mechanism of Parsaran in detail

परासरण
(OSMOSIS)


परासरण का अर्थ ⏩ अर्धपारगम्य झिल्ली द्वारा केवल और केवल विलायक के अणुओं के विसरण परासण कहलाता है।, अतः दूसरे शब्दों में "परासरण वह क्रिया है जिसमें अर्धपारगम्य झिल्ली के द्वारा पृथक किए गए भिन्न सान्द्रता वाले दो घोलों में विलायक के अणुओं का विसरण कम सान्द्रता वाले घोल अर्थात विलायक की उच्च सान्द्रता वाले घोल से अधिक सान्द्रता वाले घोल अर्थात विलायक की निम्न सान्द्रता वाले घोल की तरफ होता है।" अतः परासरण भी एक प्रकार का विसरण है जिसमें दो तंत्रों के बीच में अर्धपारगम्य झिल्ली की उपस्थिति आवश्यक होती है।

परासरण की क्रिया विधि को थिसिल कीप (Thistle funnel) प्रयोग से समझा जा सकता है
⏩चित्रानुसार एक उल्टी थिसेल-कीप में शर्करा का घोल भर कर रखा जाता है। इस कीप के मुँह को चर्म-पत्र (Parchment paper) से बांध दिया जाता है। पार्चमेन्ट झिल्ली एक अर्ध-पारगम्य झिल्ली (Semi permeable membrane) के रूप में कार्य करती है और केवल विलायक के अणुओं को पारण प्रदान करती है। इस कीप को जल से भरे बीकर में रखने पर जल का चर्म पत्र या झिल्ली से होते हुए कीप में विसरण आरम्भ हो जाता है जिससे कीप में घोल की मात्रा में वृद्धि होती है।
 
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💠यह परासरण दो प्रकार का होता है

1. अंतः परासरण (Endosmosis):-किसी कोशिका को अल्पपरासरी विलयन (Hypotonic solution - ऐसा घोल जिसकी सान्द्रता कोशिका रस की सान्द्रता से कम हो) में रखने पर जल के अणु अल्पपरासरी विलयन से कोशिका में प्रवेश करते है। इस क्रिया को अंतः परासरण कहते है। दूसरे शब्दों में जल का किसी भी तंत्र में परासरणीय प्रवेश अंतः परासरण कहलाता है।


2. बहि: परासरण (Exosmosis):- यदि कोशिका को अतिपरासरी विलयन (Hypotonic solution – ऐसा घोल जिसकी - सान्द्रता कोशिका रस की सान्द्रता से अधिक हो) में रखा जाए तो जल के अणु कोशिका से बाहर निकलते है। इस क्रिया को बहि: परासरण कहते है। दूसरे शब्दों में जल का किसी भी तंत्र में से परासरणीय निकास बाह्य परासरण कहलाता है।

परासरण के महत्व

(i) मूलरोमों (Root hairs) द्वारा जल का अवशोषण तथा पौधों के अन्दर जल का एक कोशिका से दूसरी कोशिका में विसरण परासरण की प्रक्रिया द्वारा होता है।

(ii) कोशिका की स्फीति अवस्था (Turgidity) परासरण पर निर्भर करती है। यह अवस्था सभी कोशिकीय क्रियाओं के लिए आवश्यक है।

(iii) जल के पौधों के विभिन्न भाग के अंगों में वितरण परासरण द्वारा ही होता है।

(iv) तरूण कोशिकाओं की वृद्धि इसी क्रिया पर निर्भर करती है।

(v) यह क्रिया पादपों को हिमीकरण (Freezing) तथा शुष्कन (Desiccation) के प्रति प्रतिरोधी बनाती है।





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