राजस्थान के प्रमुख आधुनिक चित्रकार | राजस्थान की हस्तकलाएँ/हस्तशिल्प/लोककला | राजस्थान की हस्तकलाएँ | Rajsthan gk Most Important questions

राजस्थान के प्रमुख आधुनिक चित्रकार
⏩श्री रामगोपाल विजयवर्गीय, स्व. भूरसिंह शेखावत (गाम्य जीवन का चित्रण), स्व. श्री गोवर्द्धन लाला बाबा (भीलों के चितेरे), कृपाल सिंह शेखावत (ब्लू पॉटरी के पर्याय), पी.एन. चोयल (भैसों के चितेरे), देवकीनन्दन शर्मा, ज्योतिस्वरूप, कुन्दन लाल मिस्त्री, सौभागमल गहलोत, नरोत्तम शर्मा आदि।


राजस्थान की हस्तकलाएँ/हस्तशिल्प/लोककला
•  पड़ चित्रण-कपड़े पर लोक देवताओं की जीवनगाथाएँ, ऐतिहासिक एवं पौराणिक आख्यानों का चित्रित रूप ही 'पड़' कहलाता है। शाहपुरा (भीलवाड़ा) इसका प्रमुख केन्द्र तथा श्रीलाल जोशी इसके प्रमुख चितेरे हैं। पाबूजी, हड़बूजी, देवनारायण जी आदि की पड़ें (फड़ें) प्रसिद्ध हैं।

मांडणा –ग्रामीण क्षेत्रों में मांगलिक अवसरों पर महिलाएँ कच्चे घर-आँगन को लीप-पोत कर खड़िया, हिरमिच एवं गँरु से अनामिका की सहायता से ज्यामितीय आकृति बनाती है। जिन्हें मांडणा कहा जाता है। प्रमुख मांडणे हैं-पगल्या, साट्या (स्वास्तिक), ताम, चौकड़ी आदि।

कावड़-मंदिरनुमा काष्ठ कलाकृति जिसमें धार्मिक एवं पौराणिक आख्यानों से सम्बन्धित देवी-देवताओं के मुख्य प्रसंग चित्रित होते हैं। यह एक चलता-फिरता देवघर है।

विल–मिट्टी की महलनुमा आकृति जिसका उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में छोटी-मोटी घरेलू वस्तुएँ रखने में किया जाता है।

पिछवाइयाँ-नाथद्वारा में श्रीनाथजी की मूर्ति के पीछे लगाये जाने वाले पर्दो पर सुन्दर चित्रण किया जाता है, इन्हें पिछवाईयाँ कहते हैं।

कठपुतली– यह अरडू की लकड़ी एवं कपड़े से बनी गुडियाएँ होती हैं। जिन्हें धागों से बाँधकर सूत्रधार विभिन्न प्रकार के नाटकों का मंचन करता है। राजस्थान इस विधा की जन्मस्थली है। कठपुतली बनाने का काम उदयपुर, चित्तौड़गढ़ व कठपुतली नगर (जयपुर) में किया जाता है।

घोड़ा-बावसी-मिट्टी के बने कलात्मक घोड़े, जिन्हें आदिवासी अपनी मान्यता पूर्ण होने पर पूजकर अपने इष्ट को चढ़ाते हैं। 

पाने विभिन्न देवी-देवताओं के कागज पर बने चित्र 'पाने' कहलाते हैं, जिनका विभिन्न त्यौहारों पर दीवार पर चिपकाकर पूजन किया जाता है।
राजस्थान की हस्तकलाएँ
गोदना- यह अंग चित्रांकन की कला है, जिसमें त्वचा पर सुई या काँटे से गोदकर काला रंग भर दिया जाता है। इसका निशान त्वचा पर स्थायी हो जाता है। राजस्थान में आदिवासी एवं पिछड़े वर्ग में इसका खूब प्रचलन है। अब तो यह पर्यटकों (विदेशी) लोगों) में भी इसका खूब प्रचलन हैं।

बटेवड़े –ग्रामीण अंचल में गोबर के सूखे उपलों को वर्षा से बचाने हेतु उनके ढेर को चारों ओर से गोबर से लीप दिया जाता है। जिसे 'बटवड़े' कहा जाता है।

ब्लू पॉटरी-चीनी मिट्टी के बर्तनों पर रंगीन आकर्षक चित्रकारी को ब्लू पॉटरी के नाम से जाना जाता है। जयपुर की पॉटरी विख्यात है। इस पॉटरी को आगे बढ़ाने में जयपुर के श्री कृपाल सिंह शेखावत का प्रमुख हाथ रहा है। साथ ही राज्य अनेक पॉटरी प्रसिद्ध हुई हैं, ब्लेक पॉटरी, सुनहरी एवं कागज पॉटरी इत्यादि

छपाई, रंगाई व बंधेज के वस्त्र- में सांगानेर, बगरु, पाली, बाड़मेर व बीकानेर में रंगाई, छपाई व बंधेज का कार्य बड़े पैमाने पर किया जाता है। जयपुर में सांगानेर में 'सांगानेरी' छपाई विख्यात है, बाड़मेर का 'अजरक प्रिंट', जयपुर के निकट 'बगर प्रिंट' एवं चित्तौड़गढ़ की 'जानम छपाई' इत्यादि। जोधपुर व जयपुर, शेखावाटी क्षेत्र सीकर आदि में बंधेज के लिए, लहरिये वीरजी में चूनड़ी, पीले-पोमचे प्रसिद्ध हैं।
 किशनगढ़, चित्तौड़गढ़ व कोटा की डोरियाँ की साड़ियाँ विशेष उल्लेखनीय हैं।
राजस्थान की हस्तकलाएँ
थेवा कला-काँच पर सोने की अत्यन्त महीन एवं कलात्मक कारीगरी 'थेवा' कही जाती है, इस तरह थेवा कला काँच पर सोने का सूक्ष्म चित्रांकन है। थेवा के लिएरंगीन बेल्जियम काँच का प्रयोग किया जाता है। थेवा कला द्वारा विभिन्न प्रकार की सजावटी प्लेटें, गुलदस्ते, फोओ फ्रेम, डिब्बी, बॉक्स, दर्पण, इत्रदानी, ऐश ट्रे, सिगरेटदानी, गिलास आदि बनाये जाते हैं। नारी शृंगार की वस्तुओं को भी कलात्मक रूप दिया जाता है। जैसे-हार, मंगलसूत्र, टीका, अंगूठी, करधनी, पायजेब आदि। देव प्रतिमाएँ भी थेवा द्वारा अलंकृत की जाती हैं। थेवा कला प्रतापगढ़ की महान् ऐतिहासिक धरोहर है, जो सिर्फ प्रतापगढ़ में ही की जाती है। प्रतापगढ़ का सोनी परिवार इस कला उस्ताद माना जाता है। विश्व प्रसिद्ध थेवा कला के जन्मदाता नाथूजी सोनी थे। थेवा कला को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देने के लिए जस्टिन वकी को 2009 में राजीव गाँधी राष्ट्रीय सम्मान प्रदान किया गया है।


• मीनाकारी-ज्वैलरी पर मीनाकारी के लिए जयपुर
अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर चुका है। यह कला महाराजा मानसिंह (1589 1614 ई.) द्वारा लाहौर से आमेर लाई गई थी। इस कला का उद्भव फारस (ईरान) में हुआ था। जयपुर में मीनाकारी का काम सोने, चाँदी और ताँबे पर किया जाता है। सोने पर मीनाकारी के लिए काले, नीले, गहरे पीले, नारंगी और गुलाबी रंग का प्रयोग किया जाता है। ताँबे पर सफेद, काला और गुलाबी रंग ही काम में लिया जाता है। लाल रंग बनाने में जयपुर के मीनाकार कुशल है। ज्वैलरी के अतिरिक्त तलवार, छुरियों की मूँठ, सिगरेट केस आदि पर भी मीनाकारी की जाती है। कुदरतसिंह जो मीनाकारी के प्रसिद्ध कलाकार है, को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है

मंसूरिया साड़ी (कोटा डोरिया) - कोटा के निकट बुनकरों का एक गाँव कैथून है, जो मंसूरिया साड़ी के लिए प्रसिद्ध है। किंवदति है कि झाला जालमसिंह ने 1761 ई. में मैसूर से कुछ बुनकरों को बुलाया, जिनमें महमूद मंसूरिया सर्वाधिक कुशल या उसने ही यहाँ सर्वप्रथम हथकरघा उद्योग की स्थापना की तथा उसी के नाम पर साड़ी का नाम मंसूरिया साड़ी हो गया। इसे 'कोटा डोरिया' नाम से जाना जाता है।


राजस्थान की हस्तकलाएँ

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ