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झालावाड़ | झालावाड़ जिले के संथापक कोन थे |झालावाड़ का इतिहास | Jhalawar - District in Rajasthan

झालावाड़
🔷 झालावाड़ की सम्पूर्ण जानकारी 🔷

शीतलेश्वर (चंद्रमौलिश्वर) : चंद्रभागा नदी के तट पर झालावाड़ के इस मंदिर का निर्माण राजा दुर्गण के सामन्त वाप्पक ने महादेव मंदिर के साथ वि.स. 746 (689 ई.) में किया था। यह देवालय राजस्थान के तिथियुक्त देवालयों में सबसे प्राचीन है।

झालरापाटन का वैष्णव : इसे 'सात सहेलियों का मंदिर' भी कहते हैं। कर्नल टॉड ने इसे 'चारभुजा का मंदिर' मंदिर (पझनाभ मंदिर) भी कहा है। यह मंदिर कच्छपघात शैली का हैं।

शांतिनाथ जैन मंदिर, झालरापाट: 10वीं से 12वीं शताब्दी के मध्य बना यह मंदिर कच्छपघात शैली का है। मंदिर के गर्भगृह में काले रंग के पत्थर की आदमकदीय शांतिनाथ दिगम्बर जैन प्रतिमा है।

चांदखेड़ी का जैन मंदिर : झालावाड़ के खानपुर में यह एक प्राचीन जैन मंदिर है जिसमें आदिनाथ की विशाल प्रतिमा स्थापित है। 

• चन्द्रभागा मंदिर : चन्द्रभागा नदी के तट पर स्थित सातवीं सदी का मंदिर है। ये गुप्तोत्तरकालीन मंदिर है। 


नागेश्वर पार्श्वनाथ: चौमहला (झालावाड़) में प्रसिद्ध जैन तीर्थ नागेश्वर पार्श्वनाथ स्थित है।

● भवानी नाट्यशाला: वर्ष 1921 में राजा भवानी सिंह द्वारा पारसी ऑपेरा शैली में निर्मित्त अनोखी नाट्यशाला 

● झालरापाटन : 'City of Bells' के नाम से प्रसिद्ध। कोटा राज्य के सेनापति जालिम सिंह ने चंद्रावती नगर के ध्वंसावशेषों पर झालरा पाटन नगर की स्थापना की। यह चंद्रभागा नदी के तट पर स्थित है। यहाँ कार्तिक पूर्णिमा को चन्द्रभागा मेला आयोजित होता है।

● कौल्वी की बौद्ध गुफाएँ : डग पंचायत क्षेत्र में कौल्वी, विनायका, हथियागौड़ एवं गुनई में स्थित बौद्ध गुफाएँ।

• गागरोन दुर्ग : (डोडगढ़/ धूलरगढ़) (जलदुर्ग)
: आहू और कालीसिंध नदियों के संगम स्थल 'सामेलजी' के निकट मुकन्दरा की पहाड़ी पर स्थित इस दुर्ग का निर्माण डोड (परमार) राजपूतों द्वारा करवाया गया था। खींची नामक राजवंश के संस्थापक देवनसिंह ने इसे जीतकर इसका नाम गागरोन रखा। सूफी सन्त हमीदुद्दीन चिश्ती (संत मीठेशाह) की दरगाह व संत पीपा की छतरी यहाँ स्थित हैl 

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