समायोजन का अर्थ | समायोजन pdf | समायोजन का अर्थ एवं परिभाषा | समायोजन की प्रक्रिया है |what is the setting | Meaning and definitions of adjustment

समायोजन का अर्थ- समायोजन को सामंजस्य, व्यवस्थापन अथवा अनुकूलन भी कहा जाता है।

▶️समायोजन शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है- 'सम' और 'आयोजन' ।

▶️ 'सम' का तात्पर्य है- भली-भाँति, अच्छी तरह अथवा समान रूप से।

▶️'आयोजन' का तात्पर्य है- व्यवस्था अर्थात् अच्छी तरह से
व्यवस्था करना।

▶️इस तरह समायोजन का अर्थ है- सुव्यवस्था अथवा अच्छे ढंग से परिस्थितियों को अनुकूल बनाने की प्रक्रिया जिससे कि व्यक्ति की आवश्यकताएँ पूरी हो जायें और उसमें मानसिक द्वन्द्व न उत्पन्न होने पावे।

समायोजन की प्रमुख परिभाषाएँ

1. कोलमैन -
▶️"समायोजन, व्यक्ति की अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति तथा कठिनाईयों के निराकरण के प्रयासों का परिणाम है।" 

स्किनर - 2.
▶️'समायोजन शीर्षक के अन्तर्गत हमारा अभिप्राय इन बातों
से है, सामूहिक क्रिया-कलापों में स्वस्थ तथा उत्साहमय ढंग से भाग लेना, समय पड़ने पर नेतृत्व का भार उठाने की सीमा तक उत्तरदायित्व वहन करना तथा सबसे बढ़कर समायोजन में अपने को किसी भी प्रकार का धोखा देने से बचने की कोशिश करना।"

3. स्मिथ
▶️'अच्छा समायोजन वह है जो यथार्थ पर आधारित तथा संतोष देने वाला होता है।"

4. गेट्स -
▶️"समायोजन शब्द के दो अर्थ होते हैं- प्रथम अर्थ में यह एक जीवन में लगातार चलने वाली एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक व्यक्ति अपने एवं पर्यावरण के मध्य संतुलन बनाये रखने के लिए अपने व्यवहार में परिवर्तन करता है- द्वितीय अर्थ में समायोजन एक अवस्था है अर्थात् व्यक्ति की एक संतुलित दशा है जिसे हम सुसामंजस्ययुक्त व्यक्ति कहते हैं।"

समायोजन की प्रक्रिया

⏩समायोजन अविराम गति से चलने वाली प्रक्रिया है जिसकी सहायता से व्यक्ति का जीवन अपने आप पर्यावरण के मध्य अधिक समरस सम्बन्ध बनाने का प्रयास करता है।

⏩दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति या संतुष्टि के लिए प्रयत्न करता है। इस प्रकार व्यक्ति जिसकी कुछ आवश्यकताएँ हैं और जो पर्यावरण में रहता है, अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील होगा।

⏩व्यक्ति आवश्यकताओं के अनुरूप ही अपने लक्ष्य निर्धारित करता है। यह लक्ष्य उसके पर्यावरण या व्यक्तित्व दोनों से सम्बद्ध हो सकता है। लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में कुछ बाधाएँ भी आती हैं जो व्यक्तिगत या पर्यावरण में स्थित हो सकती हैं, जैसे स्वभाव, आदतें, चिन्तन प्रणाली, सामाजिक, आर्थिक स्थिति तथा पारिवारिक स्थिति आदि । व्यक्ति बाधाओं को दूर कर विभिन्न प्रयत्न अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए करता है। 
यदि वह प्रयत्नों के फलस्वरूप लक्ष्य प्राप्त कर लेता है तो प्रसन्न और संतुष्ट हो जाता है और समायोजित कहलाता है।

⏩यदि लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती और उसके फलस्वरूप व्यक्ति में भग्नाशा अथवा कुण्ठा विकसित हो जाती है तो उसे असमायोजित व्यक्ति की संज्ञा प्रदान की जाती है।

⭕इस प्रकार स्पष्ट है कि समायोजन की प्रक्रिया में निम्न बातों का होना आवश्यक है।

1. व्यक्ति में आवश्यकताओं, इच्छाओं तथा लक्ष्यों का होना। 2. बाधाएँ जो व्यक्ति को भग्नाशा की ओर उन्मुख करती हैं।
3. व्यक्ति की विभिन्न अनुक्रियाएँ अथवा व्यवहार
4. लक्ष्य की प्राप्ति या तनाव का कम होना।

सुसमायोजित व्यक्ति के लक्षण

1. सुसमायोजित व्यक्ति वातावरण और परिस्थितियों का ज्ञान और नियंत्रण रखने वाला और उन्हीं के अनुसार आचरण करने वाला होता है।

2. वह स्वयं और पर्यावरण के मध्य संतुलन बनाये रखता है।

3. वह अपनी आवश्यकता और इच्छा के अनुसार पर्यावरण एवं वस्तुओं का लाभ उठाता है।

4. वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समाज के अन्य लोगों को बाधा नहीं पहुँचाता।

5. वह साधारण परिस्थितियों में संतुष्ट और सुखी रहकर अपनी कार्यकुशलता को बनाये रखता है।

6. वह सामाजिकता की भावना से युक्त आदर्श चरित्र वाला, संवेगात्मक रूप से संतुलित और उत्तरदायित्व को स्वीकार करने वाला होता है।

7. उसके स्पष्ट उद्देश्य होते हैं और वह साहसपूर्वक एवं ठीक ढंग से कठिनाइयों एवं समस्याओं का सामना करता है।

● गेट्स और अन्य विद्वानों के शब्दों में हम कह सकते हैं कि, 'संक्षेप में सुसमायोजित व्यक्ति वह है जिसकी आवश्यकताएँ और तृप्ति, सामाजिक दृष्टिकोण और सामाजिक दायित्व की स्वीकृति के साथ संगठित हो ।'



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